
राधिकाष्टकम् श्रीराधिका की महिमा का गुणगान करने वाली एक भक्तिपूर्ण स्तुति है। श्री रघुनाथ दास गोस्वामी द्वारा रचित यह प्रार्थना श्रीराधा के दिव्य गुणों का सुंदर वर्णन करती है और भक्त के हृदय में उनकी सेवा प्राप्त करने की गहन अभिलाषा को व्यक्त करती है।
(1)
रसवलित-मृगाक्षी-मौलिमाणिक्यलक्ष्मीः
प्रमुदित-मुरवैरि-प्रेम-वापी-मराली ।
व्रजवर-वृषभानोः पुण्य-गिर्वाण-वल्ली
स्नपयतु निज-दास्ये राधिकां मां कदा नु ॥
श्रीराधिका, जो अमृतमयी मृगनयनी गोपियों के मुकुट की शोभायमान मणि के समान हैं, प्रसन्नचित्त श्रीकृष्ण के प्रति प्रेमरूपी सरोवर में विचरण करने वाली हंसिनी हैं और व्रजश्रेष्ठ राजा वृषभानु के पुण्यरूपी उद्यान में उत्पन्न हुई दिव्य लता के समान हैं—वे मुझे अपनी सेवा में कब स्नान कराएँगी?
(2)
स्फुरदरुण-दुकूल-द्योतितोद्यन्नितम्ब-
स्थलमभि वर-काञ्ची-लास्यमुल्लासयन्ती ।
कुचकळश-विलास-स्फीत-मुक्तासरश्रीः
स्नपयतु निज-दास्ये राधिकां मां कदा नु ॥
श्रीराधिका, जिनके लाल रेशमी वस्त्र से सुशोभित नितम्ब-प्रदेश पर सुंदर करधनी की मधुर झंकार नृत्य करती है और जिनके उन्नत स्तनरूपी कलशों पर बड़ी-बड़ी मोतियों की माला शोभायमान होती है—वे मुझे अपनी सेवा में कब स्नान कराएँगी?
(3)
सरसिज-वर-गर्भाखर्व-कान्तिः समुद्यत्-
तरुणिम-घनसाराश्लिष्ट-कैशोर-सीधुः ।
दरविकसित-हास्य-सन्दि-बिम्बाधराग्रा
स्नपयतु निज-दास्ये राधिकां मां कदा नु ॥
श्रीराधिका, जिनकी कान्ति पूर्ण विकसित कमल के भीतरी भाग के समान मनोहर है, जिनका किशोरावस्था का सौन्दर्य नवयौवन के कपूर से मिश्रित मधुर अमृत के समान है और जिनके बिम्बफल के समान अधरों के अग्रभाग पर मंद मुस्कान खिलती रहती है—वे मुझे अपनी सेवा में कब स्नान कराएँगी?
(4)
अतिचटुलतरं तं काननान्तर्मिलन्तं
व्रजनृपतिपुत्रं वीक्ष्य शङ्काकुलाक्षी ।
मधुरमृदुवचोभिः संस्तुता नेत्रभङ्ग्या
स्नपयतु निजदास्ये राधिकां मां कदा नु ॥
श्रीराधिका, जो वन के एकान्त में अत्यन्त चंचल श्रीकृष्ण से अचानक मिलकर उन्हें संदेह से भरी दृष्टि से देखती हैं और उनके मधुर, कोमल वचनों तथा प्रेमपूर्ण नेत्रों के संकेतों से प्रसन्न होती हैं—वे मुझे अपनी सेवा में कब स्नान कराएँगी?
(5)
व्रजकुलमहिलानां प्राणभूताखिलानां
पशुपपतिगृहिण्याः कृष्णवत्प्रेमपात्रम् ।
सुललितललितान्तःस्नेहफुल्लान्तरात्मा
स्नपयतु निजदास्ये राधिकां मां कदा नु ॥
श्रीराधिका, जो व्रज की समस्त गोपियों को अपने प्राणों के समान प्रिय हैं, जो गोपराज नन्द की पत्नी माता यशोदा के लिए श्रीकृष्ण के समान ही प्रेम की पात्र हैं और जिनके कारण सुललित स्वभाव वाली श्रीललिता का अन्तःकरण प्रेम से खिल उठता है—वे मुझे अपनी सेवा में कब स्नान कराएँगी?
(6)
निरवधि सविशाखा-शाखियूथ-प्रसूनैः
स्रजमिह रचयन्ती वैजयन्तीं वनान्ते ।
अघविजय-वरोरः-प्रेयसी श्रेयसी सा
स्नपयतु निजदास्ये राधिकां मां कदा नु ॥
श्रीराधिका, जो श्रीविशाखा के साथ वन के एकान्त में अनेक वृक्षों के फूलों से वैजयन्ती माला निरन्तर बनाती रहती हैं और जो अघासुर-विजयी श्रीकृष्ण के सुंदर वक्षस्थल की परम प्रिय एवं कल्याणमयी प्रेयसी हैं—वे मुझे अपनी सेवा में कब स्नान कराएँगी?
(7)
प्रकटितनिजवासं स्निग्धवेणुप्रणादैर्
द्रुतगतिहरिमारात् प्राप्य कुञ्जे स्मिताक्षी ।
श्रवणकुहरकण्डूं तन्वती नम्रवक्त्रा
स्नपयतु निजदास्ये राधिकां मां कदा नु ॥
श्रीराधिका, जो श्रीकृष्ण की सुगन्ध को अनुभव करके और उनकी मधुर वंशी की ध्वनि सुनकर वन के कुञ्ज में शीघ्रता से उनके पास पहुँचती हैं तथा मुस्कुराती हुई आँखों और झुके हुए मुख के साथ अपने कानों की खुजली मिटाती हुई उनके समीप आती हैं—वे मुझे अपनी सेवा में कब स्नान कराएँगी?
(8)
अमल-कमल-राजि-स्पर्श-वात-प्रशीत
निज-सरसि निदाघे सायमुल्लासिनी यम् ।
परिजनगणयुक्ता क्रीडयन्ती बकारिं
स्नपयतु निजदास्ये राधिकां मां कदा नु ॥
श्रीराधिका, जो ग्रीष्म ऋतु की संध्या में अपने सरोवर के शीतल जल और निर्मल कमलों को स्पर्श करके आने वाली शीतल वायु से प्रसन्न होकर अपनी सखियों के साथ श्रीकृष्ण के साथ क्रीड़ा करती हैं—वे मुझे अपनी सेवा में कब स्नान कराएँगी?
(9)
पठति विमलचेताः मिष्ट-राधाष्टकं यः
परिहृत-निखिलाशा-सन्ततिः कातरः सन् ।
पशुपति-कुमारः काममामोदितस्तं
निजजनगणमध्ये राधिकायास्तनोति ॥
जो व्यक्ति निर्मल हृदय से, सांसारिक सुखों की समस्त आशाओं को त्यागकर और श्रीराधा की सेवा की तीव्र अभिलाषा से व्याकुल होकर इस मधुर राधाष्टकम् का पाठ करता है, उससे प्रसन्न होकर व्रज के राजकुमार श्रीकृष्ण स्वयं उसे श्रीराधिका के निजजनों के मध्य स्थान प्रदान करते हैं।
राधिकाष्टकम्: श्री रूप गोस्वामी कृत स्तुति
राधिकाष्टकम् श्रीराधा की महिमा और उनके दिव्य गुणों का वर्णन करने वाली एक भक्तिपूर्ण स्तुति है। श्री रूप गोस्वामी द्वारा रचित यह स्तुति भक्त की श्रीराधारानी का निरन्तर स्मरण करने और उनकी सेवा में लगे रहने की सच्ची अभिलाषा को व्यक्त करती है।
(1)
दिशि दिशि रचयन्तीं सञ्चरन्नेत्रलक्ष्मी-
विलसित-खुरलीभिः खञ्जरीटस्य खेलाम् ।
हृदय-मधुप-मल्लीं बल्लवाधीश-सूनोर्
अखिल-गुण-गभीरां राधिकामर्चयामि ॥
मैं श्रीराधिका की आराधना करता हूँ, जिनकी सुंदर आँखें सभी दिशाओं में चंचल खञ्जरीट पक्षियों के समान खेलती हुई शोभा बिखेरती हैं। जो व्रजराज नन्द के पुत्र श्रीकृष्णरूपी भ्रमर के हृदय के लिए मल्लिका-पुष्प के समान हैं और जो सभी दिव्य गुणों में अत्यन्त गंभीर हैं।
(2)
पितुरिह वृषभानोरन्ववाय-प्रशस्तिं
जगति किल समस्ते सुष्ठु विस्तारयन्तीम् ।
व्रजनृपतिवर-कुमारं खेलयन्तीं सखीभिः
सुरभिणि निजकुण्डे राधिकामर्चयामि ॥
मैं श्रीराधिका की आराधना करता हूँ, जो अपने पिता महाराज वृषभानु के कुल की कीर्ति को सम्पूर्ण संसार में विस्तार देने वाली हैं। जो अपनी सखियों के साथ व्रज के राजकुमार श्रीकृष्ण के साथ अपने सुगन्धित राधाकुण्ड में क्रीड़ा करती हैं।
(3)
शरदुपचित-राका-कौमुदी-नाथ-कीर्ति-प्रकर-
दमना-दीक्षा-दक्षिण-स्मेर-वक्त्राम् ।
नटदघभिदपाङ्गोत्तुङ्गितानङ्गरङ्गां
कलितरुचि-तरङ्गां राधिकामर्चयामि ॥
मैं श्रीराधिका की आराधना करता हूँ, जिनका मुस्कुराता हुआ मुख शरद् ऋतु की पूर्णिमा के चन्द्रमा की सम्पूर्ण शोभा को भी परास्त करने के संकल्प से युक्त प्रतीत होता है। जिनके चंचल कटाक्ष श्रीकृष्ण की ओर से काम-क्रीड़ा को और अधिक उद्दीप्त करते हैं तथा जिनके अंगों पर सौन्दर्य की मनोहर तरंगें लहराती रहती हैं।
(4)
विविध-कुसुम-वृन्दोत्फुल्ल-धम्मिल्ल-घाटी-
विघटित-मद-घूर्णत्-केकि-पिञ्छ-प्रशस्तिम् ।
मधुरिपु-मुख-बिम्बोद्गीर्ण-ताम्बूल-राग-
स्फुरद्-अमल-कपोलां राधिकामर्चयामि ॥
मैं श्रीराधिका की आराधना करता हूँ, जिनकी विभिन्न प्रकार के खिले हुए पुष्पों से सजी वेणी प्रेमभाव से उन्मत्त होकर घूमते हुए मोर की फैली हुई पूँछ के समान शोभायमान होती है। जिनके निर्मल कपोल श्रीकृष्ण के मुख से प्राप्त ताम्बूल के लाल रंग से दमकते रहते हैं।
(5)
अमलिन-ललितान्तः-स्नेह-सिक्तान्तरङ्गाम्
अखिल-विधि-विशाखा-सख्य-विख्यात-शीलाम् ।
स्फुरदघभिदनर्घ-प्रेम-माणिक्य-पेटीं
धृत-मधुर-विनोदां राधिकामर्चयामि ॥
मैं श्रीराधिका की आराधना करता हूँ, जिनका अन्तःकरण श्रीललिता के प्रति निर्मल और घनिष्ठ स्नेह से सिंचित है। जिनकी श्रीविशाखा के साथ सभी प्रकार की सख्यता प्रसिद्ध है। जो श्रीकृष्ण के लिए अमूल्य प्रेमरूपी रत्नों से भरी हुई पेटिका के समान हैं और जिनका स्वभाव मधुर विनोद से परिपूर्ण है।
(6)
अतुल-महसि वृन्दारण्य-राज्येऽभिषिक्ताम्
निखिल-समय-भर्तुः कार्तिकस्याधिदेवीम् ।
अपरिमित-मुकुन्द-प्रेयसी-वृन्द-मुख्याम्
जगदघहर-कीर्तिं राधिकामर्चयामि ॥
मैं श्रीराधिका की आराधना करता हूँ, जिनका अभिषेक अतुलनीय तेज से प्रकाशित वृन्दावन के राज्य की रानी के रूप में किया गया है। जो सम्पूर्ण समयों में श्रेष्ठ कार्तिक मास की अधिष्ठात्री देवी हैं। जो असंख्य मुकुन्द-प्रिय गोपियों में प्रमुख हैं और जिनकी कीर्ति सम्पूर्ण जगत के पापों का नाश करने वाली है।
(7)
हरिपद-नख-कोटी-पृष्ठ-पर्यन्त-सीमा-
तटमपि कलयन्तीं प्राणकोटेरभीष्टम् ।
प्रमुदित-मदिराक्षी-वृन्द-वैदग्ध्य-दीक्षा-
गुरुमतिगुरु-कीर्तिं राधिकामर्चयामि ॥
मैं श्रीराधिका की आराधना करता हूँ, जो श्रीहरि के चरण-नखों के छोर की सीमा तक को भी अपने करोड़ों प्राणों से अधिक प्रिय मानती हैं। जो प्रसन्न और चंचल नेत्रों वाली गोपियों को प्रेम-कौशल की शिक्षा देने वाली गुरु हैं और जिनकी महिमा अत्यन्त महान है।
(8)
अमल-कनक-पट्टोद्घृष्ट-कश्मीर-गौरीं
मधुरिमा-लहरीभिः सम्परीतां किशोरीम् ।
हरिभुज-परिरब्धां लब्ध-रोमाञ्च-पालीं
स्फुरदरुण-दुकूलां राधिकामर्चयामि ॥
मैं श्रीराधिका की आराधना करता हूँ, जिनकी कान्ति शुद्ध स्वर्ण पर घिसे हुए केसर के समान गौरवर्ण और मनोहर है। जिनका किशोरी स्वरूप माधुर्य की अनगिनत तरंगों से घिरा हुआ है। श्रीहरि की भुजाओं के आलिंगन से जिनके अंग रोमांच से पुलकित हो उठते हैं और जो चमकीले अरुण रंग के वस्त्र धारण करती हैं।
(9)
तदमल-मधुरीणां काममाधाररूपं
परिपठति वरिष्ठं सुष्ठु राधाष्टकं यः ।
अहिमकिरण-पुत्री-कूल-कल्याण-चन्द्रः
स्फुटमखिलमभीष्टं तस्य तुष्टस्तनोति ॥
जो भक्त इस निर्मल माधुर्य के पूर्ण आधारस्वरूप श्रेष्ठ राधाष्टकम् का श्रद्धापूर्वक और अच्छी प्रकार से पाठ करता है, उस पर सूर्यदेव की पुत्री यमुना के तट पर स्थित कल्याणरूपी चन्द्रमा श्रीकृष्णचन्द्र प्रसन्न होते हैं और उसकी सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करते हैं।
राधिकाष्टकम्: श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा रचित
राधिकाष्टकम् श्रीराधा के दिव्य सौन्दर्य और गुणों की स्तुति करने वाली एक संस्कृत प्रार्थना है। श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा रचित यह स्तुति श्रीराधारानी के प्रति गहरी भक्ति और श्रद्धा को व्यक्त करती है।
(1)
कुङ्कुमाक्त-काञ्चनाब्ज-गर्व-हारि-गौरभा
पीतनाञ्चिताब्ज-गन्ध-कीर्ति-निन्दि-सौरभा ।
बल्लवेश-सूनु-सर्व-वाञ्छितार्थ-साधिका
मह्यमात्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका ॥
श्रीराधिका का गौरवर्ण लाल कुङ्कुम से सुशोभित स्वर्णिम कमल के गर्व को भी हर लेने वाला है। उनकी मधुर सुगन्ध के सामने केसर से सुवासित कमल की सुगन्ध की प्रसिद्धि भी फीकी पड़ जाती है। वे व्रजराज के पुत्र श्रीकृष्ण की सभी इच्छाओं को पूर्ण करने में पूर्णतः समर्थ हैं। ऐसी श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों की सेवा प्रदान करें।
(2)
कौरविन्द-कान्ति-निन्दि-चित्र-पट्ट-शाटिका
कृष्ण-मत्त-भृङ्ग-केलि-फुल्ल-पुष्प-वाटिका ।
कृष्ण-नित्य-सङ्गमार्थ-पद्म-बन्धु-राधिका
मह्यमात्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका ॥
श्रीराधिका के अद्भुत और रंग-बिरंगे रेशमी वस्त्र लाल मूँगे की कान्ति को भी लज्जित कर देते हैं। वे खिले हुए पुष्पों की ऐसी वाटिका के समान हैं, जिसमें श्रीकृष्णरूपी उन्मत्त भ्रमर अपनी मधुर क्रीड़ाएँ करते हैं। वे अपने प्रिय श्रीकृष्ण का निरन्तर संग प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन सूर्यदेव की पूजा करती हैं। ऐसी श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों की सेवा प्रदान करें।
(3)
सौकुमार्य-सृष्ट-पल्लवालि-कीर्ति-निग्रहा
चन्द्र-चन्दनोत्पलेन्दु-सेव्य-शीत-विग्रहा ।
स्वाभिमर्श-बल्लवीश-काम-ताप-बाधिका
मह्यमात्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका ॥
श्रीराधिका की मनोहर किशोरावस्था की कोमलता नवीन अंकुरित पत्तियों की कोमलता की प्रसिद्धि को भी फीका कर देती है। उनका शीतल स्वरूप चन्द्रमा, चन्दन, कमल और कपूर जैसे शीतल पदार्थों द्वारा सेवा करने योग्य है। जब वे गोपियों के स्वामी श्रीकृष्ण को स्पर्श करती हैं, तब उनके कामजनित विरह-ताप को दूर कर देती हैं। ऐसी श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों की सेवा प्रदान करें।
(4)
विश्व-वन्द्य-यौवताभिवन्दितापि या रमा
रूप-नव्य-यौवनादि-सम्पदा न यत्समा ।
शील-हार्द-लीलया च सा यतोऽस्ति नाधिका
मह्यमात्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका ॥
श्रीलक्ष्मीदेवी, जिनकी स्वयं अन्य दिव्य युवतियाँ भी आराधना करती हैं और जिनकी सम्पूर्ण संसार में वन्दना होती है, वे भी सौन्दर्य, मनोहर यौवन तथा अन्य दिव्य सम्पदाओं में श्रीराधिका के समान नहीं हैं। स्वाभाविक स्नेह और दिव्य प्रेममयी लीलाओं में भी इस संसार या आध्यात्मिक जगत में श्रीराधिका से बढ़कर कोई नहीं है। ऐसी श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों की सेवा प्रदान करें।
(5)
रास-लास्य-गीत-नर्म-सत्कलालि-पण्डिता
प्रेम-रम्य-रूप-वेश-सद्गुणालि-मण्डिता ।
विश्व-नव्य-गोप-योषिदालितोऽपि याधिकाः
मह्यमात्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका ॥
श्रीराधिका रास-नृत्य, गायन, हास-परिहास आदि अनेक दिव्य कलाओं में अत्यन्त निपुण हैं। वे प्रेममयी प्रकृति, अद्भुत सौन्दर्य, मनोहर वस्त्राभूषण और अनेक दिव्य गुणों से सुशोभित हैं। सम्पूर्ण संसार में प्रसिद्ध व्रज की गोपियों के मध्य भी वे प्रत्येक प्रकार से सर्वश्रेष्ठ हैं। ऐसी श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों की सेवा प्रदान करें।
(6)
नित्य-नव्य-रूप-केलि-कृष्ण-भाव-सम्पदा
कृष्ण-राग-बन्ध-गोप-यौवतेषु कम्पदा ।
कृष्ण-रूप-वेश-केलि-लग्न-सत्समाधिका
मह्यमात्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका ॥
श्रीराधिका नित्य नवीन सौन्दर्य, नित्य नवीन लीलाओं और श्रीकृष्ण के प्रति नित्य नवीन प्रेम की सम्पदा से सम्पन्न हैं। श्रीकृष्ण के प्रति उनके प्रगाढ़ प्रेम के भाव को देखकर कृष्णप्रेम में अनुरक्त गोपियाँ भी रोमांचित और कम्पित हो उठती हैं। वे श्रीकृष्ण के सुंदर स्वरूप, वस्त्र, आभूषण और उनकी दिव्य लीलाओं के ध्यान में सदैव लीन रहती हैं। ऐसी श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों की सेवा प्रदान करें।
(7)
स्वेद-कम्प-कण्टकाश्रु-गद्गदादि-सञ्चिता
मर्ष-हर्ष-वामतादि-भाव-भूषणाञ्चिता ।
कृष्ण-नेत्र-तोषि-रत्न-मण्डनालि-दाधिका
मह्यमात्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका ॥
श्रीराधिका स्वेद, कम्प, रोमांच, अश्रु, गद्गद स्वर आदि अनेक सात्त्विक भावों से सुशोभित रहती हैं। मान, हर्ष, वामता आदि विभिन्न दिव्य भाव उनके भावात्मक आभूषण हैं। वे ऐसे सुंदर रत्नाभूषणों से अलंकृत रहती हैं जो श्रीकृष्ण के नेत्रों को पूर्ण प्रसन्नता प्रदान करते हैं। ऐसी श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों की सेवा प्रदान करें।
(8)
या क्षणार्ध-कृष्ण-विप्रयोग-सन्ततोदिता-
नेक-दैन्य-चापलादि-भाव-वृन्द-मोदिता ।
यत्न-लब्ध-कृष्ण-सङ्ग-निर्गताखिलाधिका
मह्यमात्म-पाद-पद्म-दास्य-दास्तु राधिका ॥
श्रीराधिका श्रीकृष्ण से आधे क्षण के लिए भी अलग होती हैं, तो विरह के कारण उनमें दैन्य, चंचलता और अनेक अन्य भाव प्रकट हो जाते हैं। जब प्रयास के बाद उन्हें श्रीकृष्ण का पुनः संग प्राप्त होता है, तब उनके विरह की समस्त व्यथा तत्काल दूर हो जाती है। ऐसी श्रीराधिका मुझे अपने चरणकमलों की सेवा प्रदान करें।
(9)
अष्टकेन यस्त्वनेन नौति कृष्ण-वल्लभाम्
दर्शनेऽपि शैलजादि-योषिदालि-दुर्लभाम् ।
कृष्ण-सङ्ग-नन्दितात्म-दास्य-सीधु-भाजनं
तं करोति नन्दितालि-सञ्चयाशु सा जनम् ॥
श्रीकृष्ण की प्रियतमा श्रीराधारानी का दर्शन प्राप्त करना भी पार्वतीजी जैसी महान देवियों के लिए अत्यन्त दुर्लभ है। जो व्यक्ति इन आठ श्लोकों द्वारा श्रीराधारानी की स्तुति करता है, श्रीकृष्ण के निरन्तर संग से प्रसन्न रहने वाली श्रीराधिका उस भक्त को अपनी व्यक्तिगत सेवा के मधुर अमृत का पात्र बना देती हैं और अपनी प्रसन्न सखियों के समूह में उसका स्थान प्रदान करती हैं।
निष्कर्ष
इन राधिकाष्टकम् स्तुतियों में श्रीराधारानी के दिव्य स्वरूप, सौन्दर्य, गुण, श्रीकृष्ण के प्रति उनके अनुपम प्रेम और उनकी सेवा की महिमा का अत्यन्त भावपूर्ण वर्णन मिलता है। श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री रूप गोस्वामी और श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा रचित इन स्तुतियों की अभिव्यक्ति भिन्न है, किन्तु उनका भक्तिमय भाव श्रीराधा के स्मरण, उनकी कृपा और उनकी सेवा की अभिलाषा से जुड़ा हुआ है।
श्रद्धा और भक्ति के साथ इन राधिकाष्टकम् का पाठ साधक को श्रीराधारानी के दिव्य गुणों का स्मरण करने, उनके प्रति भक्ति को गहरा करने और राधा-कृष्ण की सेवा-भावना को अपने हृदय में विकसित करने की प्रेरणा देता है। प्रत्येक स्तुति अपने विशिष्ट भाव के माध्यम से श्रीराधा की महिमा का चिन्तन करने का सुंदर अवसर प्रदान करती है।
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